खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती

xyzashu(75)
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पिछले वर्ष जब मैंने यहाँ पर ब्लॉग लिखना शुरू किया था तब मेरी इच्छा निरवद्यता यानि वीगानिज्म पर हिंदी में पोस्ट लिखने की थी. किंतु उस समय यहाँ पर मेरे देश भारत से काफी कम लोग उपस्थित थे और हिंदी लिखने-पढ़ने वाले तो बहुत ही नगण्य लोग थे. अतः उन दिनों मैंने अंग्रेजी में मिश्रित विषयों पर पोस्ट बनाकर अपने फोलोअर्स की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना ही उचित समझा. मुझे लोगों में यहाँ वीगन विचारधारा पर पोस्ट पढ़ने का रूझान बहुत कम नज़र आया. इसलिए मैंने कई महीनों तक क्रोसवर्ड पहेली प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें प्रतिभागियों को विभिन्न विषयों की अनेक पोस्ट पढ़नी होती थी. उनमें मैं दस से बीस फीसदी ऐसी विशिष्ट पोस्टों का समावेश अवश्य किया करता था जो कि निरवद्य (vegan) जीवन-शैली पर आधारित होती थी. इसी विषय पर मैंने कई कहानियां एवं कविताएं भी लिख कर पोस्ट करी थी, ताकि इन विधाओं में रुचि रखने वालों तक मैं अपना संदेश पहुंचा पाऊँ.

veganizer@veganizer का परिचय


कुछ समय से इस प्लेटफोर्म पर हिंदी भाषी लोगों की संख्या में अच्छा इजाफा हुआ है. लेकिन मैंने पाया है कि मेरे अनेक पाठक निरवद्यता पर और खासकर हिंदी में पोस्ट पढ़ना पसंद नहीं करते हैं. ऐसा स्वाभाविक भी है, क्योंकि मेरे ज्यादातर पाठक हिंदी भाषा से वाकिफ नहीं है. अतः मैंने यह निर्णय लिया है कि इस संबंधित हिंदी लेखन मैं अब अलग अकाउंट से पोस्ट करूंगा.

तो आज मैं आप सभी को इस नवीन अकाउंट से अवगत करवाना चाहता हूँ. कृपया इस हेतु यदि आप निम्न अकाउंट को चेक करेंगे और फोलो भी करेंगे तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी और इस विषय पर अधिक लेखन हेतु प्रोत्साहन भी मिलेगा:

veganizer@veganizer


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खून की गंगा में


मुझे याद है कि तीन-चार वर्ष पूर्व मुझे निरवद्यता पर हिंदी में कोई साहित्य ढूँढने पर भी नहीं मिल पाता था. अतः मैंने परेशान हो, स्वयं इस विषय पर हिंदी में एक पुस्तक लिखने का निर्णय किया. सन 2015 में मैंने इस पुस्तक को पूरा कर दिया था. इसका नाम था, “खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती”. लेकिन काफी समय से इसका प्रकाशन करवाने का मानस मैं नहीं बना पाया. हालाँकि अनेक लोगों ने उसकी प्रति पढ़ने के लिए मांगी थी और कइयों ने इसका डिजिटल संस्करण प्रकाशित करने का आग्रह किया था, परंतु मैं एक नई पुस्तक लिखने की सोचने लग गया था. मैंने पाया कि मेरी पुस्तक “खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती” में अधिकांशतः मैंने, अंग्रेजी साहित्य और पश्चिम में प्रचलित वीगन विचारधारा को ही हिंदी रूप दे दिया था और बीच-बीच में मैंने अपनी विचारधारा का भी समावेश कर दिया था. जाहिर है, कुछ बातें मेरी स्वयं की विचारधारा और मान्यताओं के मुताबिक नहीं थी. यही कारण था कि मैं अब तक उसका प्रकाशन करने या न करने की उधेड़बुन में था. किंतु हिंदी साहित्य में इस विषय पर सामग्री के अभाव के चलते मैंने अब इस पुस्तक को क्रमवार veganizer@veganizer अकाउंट से प्रकाशित करने का निर्णय किया है. उसके बाद मैं अपने नवीन विचार भी आप सबसे साझा करने का प्रयास करूंगा.

फिलहाल, इस पुस्तक पर मैं आप सबकी प्रतिक्रिया सुनने को आतुर रहूँगा.

इससे पहले कि मैं शुरुआत करूं, आप मुझे अपनी पसंद से भी अवगत करवा सकते हैं कि

  • एक बार में कितनी लम्बी पोस्ट पढना आपको सहज लगेगा. क्या मैं पूरे के पूरे अध्याय की एक ही पोस्ट बना दूं?
  • कुछ अध्याय थोड़े ज्यादा ही लम्बे हैं, क्या आप एक बार में पूरा पढना पसंद करेंगे? * या फिर अगले दिन नई पोस्ट पढ़ते हुए पिछली कड़ी जोड़ पाएंगे?
    मुझे आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा. तद्नुसार मैं इसको लंबी अथवा छोटी किश्तों में विभाजित करूंगा. आशा है कि आपको मेरा यह प्रयास पसंद आएगा.

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