अध्यात्म

ramyadav(29)
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जैसे कुंवारी #कन्या को #जार प्रिय होता है,,

वेद की उपमाएँ हमें सदैव अचंभित करती रही हैं,, वहाँ हर परिस्थिति के लिए उपमा दी गई है,,
जैसे #अथर्ववेद में कहा गया --अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातिमिवाघन्या,,३--३०--१,,

हम एक दूसरे को ऐसे प्रेम करें जैसे #गांय अपने अभी पैदा हुए #बछड़े से करती है,,

ठीक ऐसे ही #ऋग्वेद में जब ऋषि से शिष्य ने पूछा कि हम तो ईश्वर को बार बार भूल जाते हैं,, फिर कैसे हर क्षण उसका नाम जपें???कैसे उससे प्रेम करें???

#योषा जारमिव प्रियम--ऋग्वेद,,९--३२--५,,

जैसे कुंवारी लड़की को जार प्रिय होता है,,, सामान्यतः लोक में जार शब्द को नेगेटिव अर्थ में लिया जाता है,, एक ऐसा पुरुष जिसके अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध हों,, या वो खुद हर आने जाने वाली स्त्री के पीछे घूमता हो,,
गांव देहात में भी सुना जाता है कि भाई कभी जीवन में #चोरी #जारी मत करना,,

लेकिन वेद के ऋषियों ने एक गजब का दृष्टिकोण दिया है,, उन्होंने ये नही कहा कि जार पुरुष जिसे चाहता है,, क्योंकि वह तो किसी को भी चाह सकता है,, पुरुष के प्रेम में #चंचलता है,,

यहाँ यह कहा ऋषि ने जैसे कुँवारी कन्या को जार प्रिय होता है,, स्त्री का #समर्पण गहरा होता है,, उसका #लगाव गहरा है अंदर तक,,

तो उस समय जैसे वह अपने प्रेमी का नाम जपती रहती है हर समय मन में,, और हर पल ये चेष्टा करती है कि एक बार वो उसके सामने हो,,,
भूख प्यास,, शर्दी गर्मी,, मान अपमान,, सब सह लेती है,, बस एक बार उस प्यारे के #दर्शन हो जाएं,, वो मिल जाए,,,

शायद #मीरा इस वेद मन्त्र को सार्थक करती नजर आती है,,,

मुझे नहीं लगता इससे सुंदर और #प्रगाढ़ उपमा ईश्वर प्रेम की अन्य कोई दी जा सके,,,

तू उस #परमात्मा को ऐसे प्रेम कर,,, जैसे कन्या अपने प्रेमी को करती है,,,

ॐ श्री #परमात्मने नमः

अध्यात्म | Ecency