ये रिश्ता अब दोस्ती से ज्यादा कुछ हो चला था शायद वो जो मैं कभी होने देना नहीं चाहता था वो झूठ नहीं कह रही थी कोई ड्रामा नहीं कर रही थी उसकी मासूमियत से भरी सुर्ख लाल आँखे और बहते हुए अश्क उसके दिल का दर्द साफ लफ़्जो में बयां कर रहे थे, वो दो घंटे तक मेरी बाहों में लिपट कर रोती रही और बस एक ही बात कहती रही की मत जाओ मुझे छोड़ कर मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी "मैं तुमसे बहुत प्यार करती" हूँ और मुझसे भी वही शब्द सुनना चाहती थी मगर कैसे उसे समझाता की मेरे दिल पर मेरी हर धड़कन पर हर साँस पर किसी और का नाम लिखा है, मैं सब कुछ कर सकता था मगर ये 3 शब्द उसको नहीं बोल सकता था, वो मेरी दोस्त थी मेरी बहुत अच्छी दोस्त मगर प्यार नहीं ...
मैंने कभी किसी से झूठा वादा नहीं किया था मगर उस दिन पहली बार उसके लिए मैने उससे झूठा वादा किया की "हाँ मैं आऊँगा 2 महीने बाद जुलाई में फिर लौट कर आऊँगा जरूर आऊँगा", क्यों की 21 वसंत देखने के बाद ज़िन्दगी ने इतना तो सीखा ही दिया था की वक़्त हर जख्म न सही कुछ तो भर ही देता है, जुलाई तक वो मुझे बेशक भुला तो नहीं पाएगी मगर उसमे उस महरुमियत के अहसास से लड़ने की ताकत जरूर आ जायेगी जो अभी उसमे नहीं है ....
सच्चाई ये है की मैं जा रहा हूँ हमेशा हमेशा के लिए, जिंदगी में शायद फिर कभी दोबारा उससे मुलाकात न हो पाएगी और इसलिए भी मुझे ये डर सता रहा है की मेरे जाने के बाद कहीं वो कुछ उल्टा सीधा न कर ले इसलिए उसे एक झूठी उम्मीद दें कर जा रहा था जिसके सहारे वो कम से कम 2 महीने खुश तो रह पाएगी 2 महीने बाद बेशक उसका भ्रम टूट जाएगा और शायद इसी बहाने वो मुझसे नफरत भी करने लगे और मुझे भूल जाए .....
तो क्या फर्क पड़ता है की वो मुझसे नफरत करे ,
तो क्या फर्क पड़ता है की वो मुझे झूठा समझे,
वो मेरे बिना खुश रहे मेरे लिए बस इतना ही काफी है ...
पहला प्यार जिंदगी में सबसे ख़ास होता है,
हाँ मैं अपने आपको हमेशा खुसकिस्मत समझूँगा उसका पहला प्यार बनने के लिए और हमेशा बदकिस्मत समझूँगा उसके लिए कभी कुछ न कर पाने के लिए ........
राहुल मेहरा