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यह सोच भी क्या चीज़ है
न तू जाने न मैं जानूँ, ऐ ज़िन्दगी
कोई देखता केवल काँटे है
तो कोई देखे केवल पंखुड़ी
इस सोच ने ऐसा क्या किया
जो मनुष्य के विनाश को
उसी का विकास बता दिया
पर इस सोच में फिर भी
ऐसी अमूल्य क्षमता है
जो मनुष्य विफलता में भी
ढूँढ़ लेता सफलता है
चाहे आसमान घिरा हो काले मेघों से
अगर सोच तुम्हारी बुलंद है
तो सूरज की किरणें मेघों से आगे बढ़ निकलती हैं
अगर सोच तुम्हारी बुलंद है
तो बंजर ज़मीन में भी फूलों की पंखुड़ियां खिलती हैं
ये सोच करिश्मे कर सकती है
एक असफल जीवन को
फूलों-सा सँवार सकती है
चाहे हार जाओ
पर मन से कभी न हारना
अगर इस संघर्ष में सफलता का स्वाद हो चखना
तो इस सोच को सदा बुलंद रखना
A poem by Sanit Jain on Flames that Roar