बहुत विस्तृत जंगल है। इस जंगल में अधिकांश वृक्ष शाल के हैं, इसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के हैं। फुनगी-फुनगी, पत्ती-पत्ती से मिले हुए वृक्षों की अनंत श्रेणी दूर तक चली गई है। घने झुरमुट के कारण आलोक प्रवेश का हरेक रास्ता बंद है। इस तरह पल्लवों का आनंद समुद्र कोस-दर-कोस– सैकड़ों-हजारों कोस में फैला हुआ है, वायु की झकझोर झोंके से बह रही हैं। नीचे घना अंधेरा, माध्याह्न के समय भी प्रकाश नहीं आता– भयानक दृश्य! उत्सव जंगल के भीतर मनुष्य प्रवेश तक नहीं कर सकते, केवल पत्ते की मर्मर ध्वनि और पशु-पक्षियों की आवाज के अतिरिक्त वहां और कुछ भी नहीं सुनाई पड़ता।
एक तो यह अति विस्तृत, अगम्य, अंधकारमय जंगल, उस पर रात्रि का समय! पतंग उस जंगल में रहते हैं लेकिन कोई चूं तक नहीं बोलता है। शब्दमयी पृथ्वी की निस्तब्धता का अनुमान किया नहीं जा सकता है; लेकिन उस अनंत शून्य जंगल के सूची-भेद्य अंधकार का अनुभव किया जा सकता है। सहसा इस रात के समय की भयानक निस्तब्धता को भेदकर ध्वनि आई– मेरा मनोरथ क्या सिद्ध न होगा ।… …
इस तरह तीन बार वह निस्तब्ध-अंधकार अलोडि़त हुआ-तुम्हारा क्या प्रण है? उत्तर मिला-मेरा प्रण ही जीवन-सर्वस्व है?
प्रति शब्द हुआ-जीवन तो तुच्छ है, सब इसका त्याग कर सकते हैं! तब और क्या है..और क्या होना चाहिए? उत्तर मिला-भक्ति!