काजल की कहानी, जिसने सर्कस देखने के बदले आपने पिता की परोपकारिता दिखी।
काजल सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसके पिता चीनी मिल में काम करते थे। उन्हें बेटी के साथ रहने के लिए कम समय मिल पाता था। उस दिन रविवार था और शहर में सर्कस लगा था। वह कई दिनों से अपने पिता से सर्कस ले जाने के लिए कह रही थी।
छुट्टी के कारण दोनों ने सर्कस जाने का कार्यक्रम बनाया। उस दिन सर्कस में काफी भीड़ थी। काजल और उसके पिता टिकट की लाइन में जाकर खड़े हो गए। उनके आगे एक लंबा-चौड़ा परिवार था। उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि शायद वे भी पहली बार सर्कस देखने आये थे।
कोई कह रहा था कि जोकर हाथी को चलाता है, तो कोई कह रहा था की जोकर सिर्फ साईकिल चलता है। काजल और उसके पिता उनकी बातें सुनकर मुस्कुरा रहे थे। आखिरकार टिकट खिड़की पर उनकी बारी आ गई। बच्चो के पिता ने कहा, "आठ बच्चो के और दो बड़ो के।' खिड़की पर बैठे शख्स ने पैसे बताये। पैसे सुनते ही उन बच्चो की मां ने पिता का हाथ छोड़ दिया। वह परेशान होकर पति की तरफ देखने लगी। पति का मुह उतर गया।
वह पलटकर अपने बच्चो की तरफ देखने लगा। काजल के पिता ने काजल की तरफ देखा और धीरे से सौ रूपए का नोट पास में जमीन पर गिरा दिया। उसके पास भी कम पैसे थे, पर उन्होंने आज यह नेक काम करने का फैसला लिया। वह उन बच्चो के पिता से बोले, ' शायद आपके कुछ पैसे गिर गए है।'
वह व्यक्ति समझ गया। उन्होंने वह नोट उठाया और काजल के पिता का हाथ पकड़कर उनकी तरफ रुआंसी आँखों से देखते हुए बोले, 'शुक्रिया।'
काजल और उसके पिता मुस्कुराते हुए वापस घर की तरफ लौटने लगे। काजल सर्कस तो नहीं देख पाई, लेकिन जो उसने देखा, वह उसके जीवन की अब तक की सबसे बड़ी सीख थी।
खुशियां दुसरो के साथ बाटने से और बढ़ जाती है।