एक श्लोक मुझे बहुत ही पसंद है जिसे आज मै आपके साथ शेयर करने जा रहा हूँ। मै कभी कभार कुछ कुछ पढ़ लेता हूँ। हम तो अपने में कामों में आजकल इतने व्यस्त हो गए है कि दोस्त लोग शिकायत करते रहते है कि तू call नहीं कर रहा है। इस वयस्त जीवन से निकल कर कभी कभी कुछ किताबें भी पढ़ लेनी चाहिए । सही कहा गया है किताबे ही ज्ञान का मुख्य श्रोत है।
श्लोक इस प्रकार है:-
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||
अर्थ:- मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य
मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता | और एक बात आलस्य जाता नहीं है उसे मार के भागना पड़ता है। हम कह सकते है कि जिसके अंदर आलस्य है उसका सफल होना बहुत ही कठिन है।