तुम नहीं जानते

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8y

छूकर के जब ऊंगलिया तुम्हरी
गुजरती है ज़िस्म पर से मेरे,
कितने ख्वाबो का खून कर जाती है ,
तुम नहीं जानते ,

तुम बस जानते हो अपनी प्यास को कैसे बुझाते हैं !!

भीड़ में लाखो की जब,
नजरे रुकती है , मुझ पर,
धीरे से गिर जाती हैं मेरे निर्वस्त्र अंग पर ,

तुम्हरी नजरो को तो शुकुन मिल जाता है,
मेरा मान खो जाता है

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