जिनवाणी : जीवन और आचरण -- भाग # २

mehta(76)
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जिनवाणी : जीवन और आचरण -- भाग # २

अब हम पिछली पोस्ट से आगे की बात प्रारम्भ करते है ।

मानव पंचेन्द्रिय जीव है । उसकी पांचो इन्द्रियों के विषय अलग-अलग हैं । इन विषयों से सावधान रहना चाहिए । इन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए । जो भी मानव विषयों के अधीन हो जाता है वह महान दु:खों का उपार्जन करता है । उत्तराध्ययन सूत्र में आता है कि –
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“खाणि अनत्थाणं उ काम भोगा ।”

काम भोग अनर्थों की खान है ।

इन पांचों इन्द्रियों में किसी एक भी इन्द्रिय के वशीभूत हो जाने पर जीवन का पतन प्रारम्भ हो जाता है । जीवन का पतन एक बार प्रारम्भ हो गया तो फिर उससे उद्धार पाना यदि असम्भव नहीं तो दुस्साध्य तो अवश्य ही है । अनेकानेक कष्ठ उठाकर ही पुन: जीवन को शुद्धता की ओर लाया जा सकता है । अत: विवेकवान व्यक्ति पहले से ही क्यों न चेत जाए ? वह विनाश के मार्ग पर चले ही क्यों ? जो हतभागे ऐसे विनाशकारी मार्ग पर चले उनकी क्या दशा हुई, यह देखिए –

एक महानगरी थी – चम्पा । सुख समृद्धि तथा वैभव वहां अथाह था । किसी भी वस्तु का अभाव न था । वहां का राजा जितशत्रु था तथा उसकी रानी सुकुमालिका थी । राजा दुर्भाग्य से विषयों में आसक्त हो गया और परिणामत: उसे राज्य भ्रष्ट होकर दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं । अमरावती से होड़ लेने वाली चम्पा नगरी का राजा राह का भिखारी बन गया ।

घटना इस प्रकार घटित हुई कि राजा जितशत्रु दिन-रात विषय-विकारों में ही लवलीन हो गया । वह अपने कर्तव्य को भी भूल गया । राज्य-कार्य की और से उदासीन होकर वह अहर्निश भोग-विलास में ही रत रहने लगा । ऐसी स्थिति में राज्य कैसे चले ? प्रजा का सरंक्षण कैसे हो ? बाड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का क्या हो ? राजा ही दुराचरण में डूब जाए तो प्रजा क्या करे ? उस पर कैसा प्रभाव पड़े ?

अस्तु मंत्रिमंडल ने राजा को सावधान करने का प्रयत्न किया – “राजन ! विचार कीजिए ।”

किन्तु कामान्ध और मोहान्ध राजा कब सुनने वाला था ? हितकर वचन उसे विष-से लगते । उसने कुछ नहीं विचारा । किसी की नहीं सुनी । कहा गया है न –

“कामातुरा न भयं न लज्जा ।”

कामातुर व्यक्ति को न भय होता है न ही लज्जा । राजा जितशत्रु भी अन्धा बन रहा था । उसे न लज्जा आई, न कोई विचार ।

परिणामत: युवराज तथा मंत्रियों ने विचार-विमर्श कर निश्चय किया कि राजा-रानी को रात्रि के समय निद्रावस्था में वन में ले जाकर छोड़ दिया जाए । अन्य कोई मार्ग था भी नहीं ।

यही किया गया । राजा-रानी घोर, गहन अटवी में छोड़ दिए गए । राज्य भार युवराज ने सम्भाल लिया ।

प्रातःकाल हुआ । निंद्रा भंग होने पर राजा-रानी ने स्वयं को राज-प्रासाद की सुकोमल शय्या के स्थान पर घन अरण्य की नंगी धरती पर पड़ा पाया । वे समझ गए कि चिड़िया खेत चुग गई । अब पछताना ही पछताना शेष है, और उससे कुछ होने वाला नहीं ।

किसी शरण की खोज में वे आगे बढ़े । किन्तु फूलों पर ही चरण धरने वाली रानी उस कंटकाकीर्ण मार्ग पर नंगे पैर कितना चल सकती थी । उसके पैर लहूलुहान हो गए । थकान से वह चूर-चूर हो गई । प्यास से विरल हो गई । क्षुधा से उसकी स्थिति दयनीय बन गई । कामान्ध राजा ने रानी की प्यास बुझाने के लिए अपनी बाहं से रक्त निकालकर उसे पिलाया । भूख मिटाने दे लिए अपनी जांघ का मांस काटकर उसे खिलाया ।

इन भीषण, पाशविक, घोर कष्ट-प्रदायिनी परिस्थितियों में येन-केन-प्रकारेण धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए वे राजा-रानी अंतत: किसी नगरी में जा ही पहुँचे । वहां रानी के आभूषण बेचकर राजा ने कुछ धन जुटाया, रानी के तृषाक्षुधा को शान्त किया और फिर आजीविका चलाने के लिए एक मकान तथा दुकान किराये पर लेकर रहने लगा ।

महान चम्पानगरी का अधिपति छोटी-सी दुकान चलाने लगा । वह दिनभर दुकान पर रहता । रानी दिन भर अकेली पड़ी रहती । रात-दिन सैकड़ों सेवक-सेविकाओं से घिरी रहने वाली रानी का मन नहीं लगता । उसने एक दिन राजा से कहा –

“आप तो दिन-भर बाजार में रहते हैं । मैं अकेली पड़ी-पड़ी क्या करू ? मेरा मन नहीं लगता ।”

“कोई उपाय सोचेंगे, रानी !” कहकर राजा बाजार चला गया । मार्ग में उसे एक लंगड़ा व्यक्ति मिला । वह गीत गाता था, भीख मांगता था । राजा ने उसे सहज ही पूछ लिया – “तुम क्या करते तो, भाई ?”

“गीत गाता हूँ और भीख मांगकर गुजारा चलाता हूँ ।”

उसका स्वर मधुर था । राजा ने सोचा कि यदि यह दिनभर रानी के पास रहकर उसे मीठे-मीठे गीत सुनाया करे तो रानी का भी मन लग जाए । अत: उसने कहा –

“सुनो भाई, मेरे घर रहा करोगे? मेरी पत्नी अकेली रहती है । उसे गीत सुनाया करना । तुम्हारी आजीविका चलती रहेगी ।”

यदि अन्धे को दो आँखे चाहिए तो लंगड़े को इससे अधिक क्या चाहिए था ? वह तत्काल सहमत हो गया । लंगड़ा राजा के घर रहने लगा । राजा दुकान पर जाता । लंगड़ा रानी को मीठे गीत सुनाता । धीरे-धीरे उस लंगड़े गायक और वासना की मारी रानी में वासना-जन्य अनुरक्ति उत्पन्न हो गई । वे परस्पर विषय-भोग में लीन हो गए । किन्तु चोर के मन में शंका तो सदैव बनी ही रहती है । रानी भी शंकित रहने लगी कि यदि किसी दिन राजा को यह भेद ज्ञात तो गया तो वह प्राण ही ले लेगा । अत: उसने सोचा – न रहे बांस न बजे बांसुरी ।

उसने निश्चय कर लिया कि राजा को ही समाप्त कर देना चाहिए ।

क्या यह गतन की पराकाष्ठा नहीं है ? जब एक बार पतन प्रारम्भ हो जाता है तब फिर उसका अन्त कहां आएगा, यह कहा नहीं जा सकता ।

इससे आगे की बात अब हम अगली पोस्ट में करेंगे । तब तक आप लोग अपनी steeming कीजिए ।
इसी से जुडी पिछली पोस्ट का जुडाव है :- https://busy.org/@mehta/4adbj4

जीवन और आचरण Steeming

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