नमस्कार साथियो आज में आपके साथ अपनी हिंदी में लिखी एक कविता साझा करने जा रहा हु। आशा है आपको पसंद आएगी।
फिऱ याद मुझे आया किस्सा उन सर्द सी काली रातों का
जब पलके तेरी गिरती थी तो नींद मुझे आ जाती थी
जब लब जो तेरे सूखे थे तो प्यास मुझे लग जाती थी
जब रातों को हम जागते थे तेरे चेहरे को तकते थे
जब आँखों ही आँखों में सारी बातें हो जाती थी
जब रात अकेली होती थी चन्दा भी तन्हा होता था
जब तुम मुझसे मिलने आती थी वो क्या प्यारा लम्हा होता था।
जब बातों ही बातों में सारी रातें कट जाती थी
जब प्यार तेरे के रंगों में सारी रातें रंग जाती थी
जब हाथ तेरा हाथों में रख हम गज़ले गाया करते थे
जब सुबहा जल्दी होती थी रातें जल्दी कट जाती थी
जब घडिया टिक टिक करके हमको सोने को बतलाती थी
जब तेरी एक मुस्कान में दुनिया ही नजर आ जाती थी
जब तेरा हर अरमान ख्वाइश मेरी बन जाता था
जब मेरा हर अरमान मेरी भी ज़िद बन जाता था
जब तुम मुझसे पूछा करती थी के प्यार क्यों इतना करते हो
जब ये तुझको समझाने में अल्फाज़ न मुझको मिलते थे
जब तेरे बिन बिता हर पल सदियों सा मुझको लगता था
जब कांधे पे तेरे रख सर बारिश में भीगा करते थे
जब कदमो की हर आहट पर मुझे आना तेरा लगता था
जब नाम तेरे लेने भर से दिल की धड़कन बढ़ जाती थी।
अब रातें सर्द सी आई है यादें तेरी वो लाई है
अब ना पलके तेरी गिरती है ना नींद ही मुझको आती है
अब ना वो तेरी आँखें है ना ही तेरी वो बातें है
अब चाँद सा मैं भी तनहा हू जो ना बीता मैं वो लम्हा हूँ
अब रातें लम्बी होती है और दिन भी न कट पातें है
अब हर अरमान मेरा, मेरी ही ख्वाइश होता है
अब अल्फाजों एहसासों में साजिश सी चलती रहती है
अब बारिश जब भी होती है आंसू में भीगा करते है
अब नाम तेरा जब आता है सब सूना सूना लगता है
कदमो की आहट होने पर डर सा मुझको लग जाता है
अब सब ये पूछा करते है क्यों खोये खोये रहते हो
है दर्द कोई तो क्यों न हमसे कहते हो
अब सर्द सियाह उन रातों का किस्सा केसे दोहराउ मैं
संभला हूँ बोहत ही मुश्किल से अब फिर कैसे मर जाऊं मैं।