एक भिखारिन की कथा, जिसकीे गरिमा ने डेविड को हैरान होने पर मजबूर कर दिया।
डेविड को अक्सर पोस्ट ऑफिस जाना पड़ता था। एक बूढी भिखारिन फ़िफ्थ स्ट्रीट पर बने उस पोस्ट ऑफिस के परिसर में लेती रहती थी। पोस्ट ऑफिस में घुसने से पहले सार्वजानिक फ़ोन बूथ के पास से ही उसके गंदे कपड़ो की बदबू आती थी। वह सोती नहीं थी, तो बड़बड़ाती रहती थी। जब पोस्ट ऑफिस बंद होने लगता, तो उस बूढ़ी भिखारिन को वहां से बाहर निकल दिया जाता।
निकलने के बाद भिखारिन फुटपाथ पर लेट जाती थी। बाहर खुली हवा के कारण उसके पास से बदबू कम आती थी। एक दिन थैंक्सगिविंग-डे पर डेविड के यहां बहुत सारा खाना बच गया। डेविड खाना पैक करके कार से फ़िफ्त स्ट्रीट पंहुच गया। पत्तियां सड़क पर उड़ रही थीं। वह पोस्ट ऑफिस के सामने वाले खेल के मैदान के सामने तार की बाड़ से टिककर बैठी थी।
डेविड ने अपनी कार सड़क के किनारे खड़ी कर दी और खिड़की खोलकर कहा, अम्मा.... क्या आप....।' तभी वह सोच में पड गया कि अचानक उस बूढ़ी भिखारिन के लिए उसके मुंह से अम्मा कयौ निकला। लेकिन न जाने क्यों वह भिखारिन उसे अम्मा जैसी ही लग रही थी।डेविड ने एक बार फिर कहा- अम्मा, मैं आपके लिए खाना लाया हूं।' यह सुनकर बूढ़ी औरत ने डेविड की ओर देखा।
फिर उसके होठ हिले और बहुत स्पष्टता से बोली-'ओह! बहुत-बहुत धन्यवाद्। लेकिन अभी मेरा पेट भरा हुआ है। तुम किसी जरूरतमंद व्यक्ति को क्योँ नहीं देते?' उसके शब्द स्प्ष्ट थे और उसका व्यवहार गरिमापूर्ण था। फिर उसने जाने की इज़ाज़त दे दी और अपना सर एक बार फिर चीथड़ों में छिपा लिया।डेविड हैरान नज़रो से उसे काफी देर तक टकटकी लगाए देखता रहा।
संतोष से बढ़कर जीवन में कोई सुख नहीं होता है।