भोले बच्चे और सुनहरी चप्पल

iamindian(41)
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साकेत की कहानी, जिसने भोले बच्चो की खुशियां लौटाई।

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साकेत दफ्तर से लौटा ही था कि पत्नी ने कहा, घर का राशन खत्म हो गया है। साकेत ने अपनी गाड़ी निकाली और सुपर मार्केट की तरफ बढ़ा। अगले दिन दिवाली थी। ऐसा लग रहा था कि पूरा शहर सुपरमार्केट पर टूट पड़ा हो। साकेत ने अपना सामान ट्रॉली में रखा और बिल की लाइन में खड़ा हो गया।

लाइन में उसके ठीक आगे ड़ो बच्चे थे। लगभग दस साल का एक लड़का था और शायद छह साल की एक लड़की थी। उन दोनों ने अपने बड़े साइज के पुराने कपडे पहन रखे थे। लड़की के हाथ में सुनहरे रंग की चप्पल थी, जिसे उसने कसकर अपने सीने से लगा रखा था। देखते ही देखते उनके बिल का नम्बर आ गया। लड़की ने चप्पल काउंटर पर बैठी महिला को दे दिया।

लड़के ने पूछा, कितना हुआ? महिला बोली, नौ सौ बीस रूपए। लड़के का चेहरा उतर गया। उसने अपनी बहन से बड़ी बहादुरी से कहा, अनु चल घर चलें। हमारे पास सिर्फ पांच सौ रुपये ही है। अनु बोली, लेकिन भैया, भगवान् जी को यह चप्पल बहुत पसन्द आएगी। साकेत पीछे खड़ा सब सुन रहा था। उन बच्चो को देखकर उसे बहुत अच्छा लगा। उसने पांच सौ रूपए का नोट निकाला और धीरे से काउंटर पर रख दिया।

यह देख कर लड़की खिलखिला उठी और साकेत से बोली, थेंक यु अंकल। साकेत ने लड़के से पूछा, अनु कह राही थी की यह चप्पल भगवान् जी को बहुत पसन्द आएगी? ऐसा क्या है इस चप्पल में? लड़का बोला, हमारी मां अस्पताल में हैं। उन्हें कैंसर है और अब वह भगवान जी के पास जाने वाली है। पापा कहते हैं, स्वर्ग में सारी जमीन सोने की होती है। मां की चप्पल टूट गई है। इसलिए अनु चाहती थी की मां भगवान् से मिलने सुनहरी चप्पल पहनकर जाएं।

जीवन में मायने समझने हों, तो आंसुओं को ख़ुशी में बादलों।

iamindian@iamindian

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