एक मासूम-सी बच्ची की कहानी, जो सिर्फ भोली ही नहीं, दिल की भी अच्छी थी।
श्याम बाबु अपने दफ्तर में सबको सामान भाव से देखते और इज़्ज़त से बात करते थे। उनके परिवार भी उन्ही की तरह मिलनसार था। एक दिन वह अपनी बेटी पिहू के साथ पार्क में गए। पिहू अभी दस साल की थी। श्याम बाबु और पिहू काफी देर तक पार्क में खेलते रहे। तभी वहां से एक सेब वाला गुजरा।
पिहू ने श्याम बाबु से सेब खाने की इच्छा जताई । श्याम बाबु ज्यादा पैसे लेकर नहीं निकले थे। लेकिन उनके पास इतने पैसे थे की वह दो सेब खरीद सके। श्याम बाबु ने दो सेब खरीद लिए। पिहू दोनों सेब अपने हाथों में लेकर खूब खुश हुई। श्याम बाबु ने पिहू से मजाक में कहा, 'पिहू, एक सेब तुम खा लो और एक पापा को दे दो।'
यह सुनते ही पिहू के हावभाव बदल गए। उसने बारी-बारी दोनों सेब उठाये और उन्हें दांत से काट लिया। श्याम बाबु उसकी यह हरकत देखकर हैरान रह गए। वह हमेशा चाहते थे की पिहू हर चीज बाटकर खाये। लेकिन पिहू ऐसी लालची और ईर्ष्यालु है, इसका पता उन्हें आज चला। उन्हें चिंता होने लगी। उन्होंने सोचा, पिहू की माँ ऐसा नहीं सीखा सकती। वह बहुत संस्कारी महिला है।
ज़रूर यह रजनी का काम होगा। रजनी उनके यहाँ आई थी। श्याम बाबु ने रजनी से बात करने के बारे में सोच लिया, क्योँकि वह पिहू को जान-बूझकर बर्बाद होते नहीं देख सकते थे। तभी पिहू ने दाए हाथ वाला सेब पापा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, 'आप यह सब खाइए यह सब ज्यादा मीठा और रसीला है।'
श्याम बाबु मुस्कुराते हुए बोले, 'पर तुमने तो दोनों सेब जूठे कर दिए। अब में कैसे खाऊंगा?' पिहू बोली, 'पापा, मैं तो सिर्फ यह देख रही थी की कौन-सा सेब ज्यादा मीठा है। रजनी आंटी कहती हैं कि किसी को कुछ देना हो, तो सबसे अच्छा ही देना हो, तो सबसे अच्छा ही देना चाहिए।' श्याम बाबु समझ गए की वह गलत थे।
सच्चाई जानने से पहले कोई निष्कर्ष नहीं निकलना चाहिए।