आदमी उड़न पंछी है।

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आदमी उडंपन्छिं है।

आज यहाँ तो कल वहां है।

ये सांसें धड़कन में जब तक बसां है

ना जाने हम कहाँ थे और कहाँ है।

क़ामयाबी बड़ी दुर है।

नजाने रब को क्या मंजूर है।

क़ामयाबी के पीछे तो सारा जहां है

रब की मंजूरी पे छोड़ते है हम 

देखते है रब की क्या रजां है।

आँखें खुली है जब तक

मंजिल की निशां है

आँखें बंद तो यह

जहां शमसां है।

 आशा करता हूँ कि मेरी कविता आपको पसंद आई होगी।

पढने के लिए बहूत बहुत धन्यवाद।

आदमी उड़न पंछी है। | Ecency