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2017-11-19 16:04
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पर्यावरण के विध्वंस से उजड़ती ये दुनिया -1 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 18]
भाग-4 खून-खराबे का महासमर -आखिर क्या है इसके कारण और परिणाम? प्रविष्टि – 18 पर्यावरण के विध्वंस से उजड़ती ये दुनिया “पृथ्वी के पास मानव की आवश्यकताओं के लिए समुचित संसाधन हैं, लेकिन उसके लोभ और विलासिता
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मेरे एक ग्लास दूध के खातिर [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 17]
मेरे एक ग्लास दूध के खातिर, बहती खून की नदियाँ फिर-फिर। मेरा कलेजा बड़ा सुकून पाता, पर तिल-तिल कर मरती गौमाता। उसका होता ता-उम्र बलात्कार, प्रसव-पीड़ा की वेदना हर-साल। संतान-विरह की चीत्कार बार-बार, बेटे
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दूध की रहस्यमय बत्तीसी [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 16]
दूध की रहस्यमय बत्तीसी (वे गोपनीय पहलू जो कोई चिकित्सक आपको नहीं बताता) “समस्त आबादी और बर्बादी की जनक है, मानव की ज्ञान-शून्यता।” माँ के दूध के सिवा सभी पशु-जनित दूध मानव के लिए बिलकुल अनावश्यक है। डेयरी
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दूध – एक धीमा जहर -2 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 15]
दूध के न पचने से आंतो में सड़ता विष-रूपी भोजन दुनिया में अधिकतर वयस्क लोग लेक्टोज़-इंटोलरेंट (लेक्टोज़ के प्रति असहिष्णु अथवा संवेदनशील) होते हैं। ये लोग दूध को ठीक से पचाने में अक्षम होते हैं। दरअसल दूध
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दूध – एक धीमा जहर [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 15]
वैसे तो कोई मुफ्त में भी जहर नहीं पीना चाहता। लेकिन यह एक विडंबना ही है कि हम अपने भोजन पर होने वाले खर्च का एक-तिहाई से आधा हिस्सा तक दूध और उससे बने उत्पादों पर खर्च करते हैं! दूध की अनुपयुक्तता का सिद्धांत
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दूध को मिला अमृत का दर्ज़ा! -2 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 14]
माँ के दूध में है अमृत्व का गुण कुदरत ने हर प्रजाति का दूध उस विशिष्ट प्रजाति के बच्चे के लिए ही डिज़ाइन किया है, ताकि उसका बच्चा बड़ा हो कर उस प्रजाति-विशेष का एक विशिष्ट प्राणी बन सके। गाय के दूध में उसके
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दूध को मिला अमृत का दर्ज़ा! [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 3, प्रविष्टि – 14]
“आदमी ही एक ऐसा जानवर है जो अपनी शैशवावस्था से लेकर मरते दम तक दूध और दूध से बने उत्पादों का सेवन करता है। परंतु इतना अमृत गटकने के बाद भी वह कभी अमर नहीं हो पाया!” पर क्या दूध ज़रूरी नहीं है? कतई नहीं।
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गाय का मशीनीकरण और उसकी ‘उत्पादकता’[खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 3, प्रविष्टि – 13]
“दुधारू गाय की लात भी भली, - यह उक्ति स्पष्ट इंगित करती है कि जब तक गाय दूध देगी, हम उसकी लात भी खा लेंगे। लेकिन जैसे ही वह दूध देना बंद करेगी, हम उसे सिर्फ लात ही नहीं मारेंगे, बल्कि छुरा भोंककर और उसका
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खून से छलकता है दूध का ग्लास [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 3, प्रविष्टि – 12]
भाग-3 श्वेत-क्रांति से निकला नीला-विष खून से छलकता है दूध का ग्लास “दूध एक सफेद रंग का खून है, जिसे माँस-उद्योग धोखे से शाकाहारियों को पिला रहा है।” क्या आप भी दूध को शाकाहार समझने की भूल करते हैं? दूध
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माँसाहार से भी घिनौना शाकाहार -3 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 11]
शक्तिशाली सांडों का अनसुना पहलू शोषण के दायरे से कोई भी अछूता नहीं है। गाय का पूरा परिवार ही इससे टूट कर बिखर जाता है। चूँकि अब मवेशियों के प्रजनन पर मनुष्य का पूर्ण नियंत्रण है। अतः बिना उसके हस्तक्षेप
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माँसाहार से भी घिनौना शाकाहार -2 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 11]
गाय को माँ कहने की चालबाज़ी “माँ का दूध अपने बच्चे के लिए अमृत-तुल्य है” - यह एक निःसंदेहास्पद तथ्य है, एक निर्विवादित, सार्वभौमिक सत्य है। इस तथ्य का अनुचित लाभ उठाने के लिए गौ-पालकों ने गाय को “सबकी माँ”
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माँसाहार से भी घिनौना शाकाहार [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 11]
माँसाहार से भी घिनौना शाकाहार “दूध, अंडा, शहद और मछली जैसे स्थापित पशु-उत्पादों को शाकाहारी खुराक बताना, शाकाहारियों की चालबाजी और दोहरे मापदण्डों को अपनाकर खुद को ही धोखा देने की बेवकूफ़ी है।” ‘शाकाहारी’
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माता पर कालिख पोतता “धर्म” [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 10]
माता पर कालिख पोतता “धर्म” “गाय के दूध का ही प्रतिफल है उसका चमड़ा और गौमाँस। दूध दुहने के लिए उठे हाथ, उसका गला घोंटने की प्राथमिक तैयारी है। दुग्ध-उत्पादों को खरीदने के लिए उपभोक्ता द्वारा दिया गया पैसा,
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अण्डे का झूठा प्रोपोगेंडा -3 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 9]
अण्डे की पौष्टिकता के झूठे दावे: अण्डे को एक हेल्थ-फूड, कम्प्लीट फूड या सम्पूर्ण और पौष्टिक भोजन के रूप में प्रचारित किया गया है। यहाँ तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे मान्यता दी है। यूनिसेफ और
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अण्डे का झूठा प्रोपोगेंडा -2 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 9]
क्या अंडा “शाकाहार” हो सकता है? प्रचार-प्रसार की गिरफ्त में आए अधिकांश भोले-भाले लोग आज अण्डे को शाकाहार मानकर उपयोग करने लगे हैं! ‘वेजिटेरियन’ की तर्ज पर ‘एगीटेरीयन’ शब्द गढ़ा गया ताकि इसका सेवन करने वाले
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अण्डे का झूठा प्रोपोगेंडा -1 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 9]
“अंडा एक शाकाहारी खाद्य-पदार्थ या कोई मल्टी-विटामिन कैप्सूल नहीं है वरन यह एक रजस्वला मादा मुर्गी की रज़ोनिवृत्ति-क्रिया के अंतर्गत उसके जननांग से स्रावित रजःस्राव है। एक बेबस मादा के मासिक-धर्म की उपज
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अण्डे-मुर्गी की कहानी का रहस्य [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 8]
“यदि अंडा और मुर्गी परस्पर एक दूसरे से पैदा होते हैं, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों ही सजीव हैं।” पहले अंडा पैदा हुआ था कि मुर्गी? यहाँ हम एक नहीं दोनों कैसे पैदा होते हैं, इसके रहस्य को उजागर करने
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भाग – 2, प्रविष्टि – 7: जब खरपत को मिली “जीने की सज़ा” [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती]
प्रविष्टि – 7 जब खरपत को मिली “जीने की सज़ा” [खरपत के जीवन की सत्य-कथा पर आधारित] ‘मौत की सज़ा’ सुन अच्छों-अच्छों की रूह कांप उठती है। परंतु इससे बदतर क्या हो सकता है जब मौत एक दवा लगने लगे और जीना एक घिनौनी
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भाग – 2: मौत के सौदों में व्यापारिक-लाभ और सिद्धांतवाद का खेल [खून की गंगा में...](गतांश से आगे)
प्रविष्टि – 6 खून के अश्रु पीते प्यासे मासूम! (गतांश से आगे) क्या अधिक-शोषण की अपेक्षा कम शोषण वाले उत्पादों का उपभोग बेहतर नहीं हैं? इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि किसी भी प्रकार के पशु-उत्पाद को
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भाग – 2: मौत के सौदों में व्यापारिक-लाभ और सिद्धांतवाद का खेल [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती]
प्रविष्टि - 6, खून के अश्रु पीते प्यासे मासूम! “आँसू खून का ही दूसरा रूप हैं, जिनका कोई रंग नहीं होता।” गणितीय आंकड़े पूर्ण सत्य उजागर करने में सक्षम नहीं होते। वे केवल एक ही पहलू पर प्रकाश डालते हैं कि
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