एक 'उम्मीद' (Hindi Poetry) -Thought #10

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Thought #10
Hindi Poetry

उम्मीदों पर टिका है,
सब कुछ, हम-तुम और
हमारा जीवन, वो अहसास,
वो कमी, जो है भी और नहीं भी,
समय की गति, जो कभी
रूकती नहीं, न करती है,
इन्तजार उनका, जो छूट जाते है,
टूट जाते है, बिखर जाते है,
बन कर मोती, क्या आसान है
उन्हें फिर से पिरोना,
किसी नए प्रीत के धागे में,
कच्चे धागे, जो तोड़े गए,
डर से, उस समाज के,
जो खुद है इतना कमजोर,
उम्मीदों से रिक्त,
संभावनाओं से हीन,
दबा-कुचला हुआ,
अपनी निराशा मिटाने को,
तत्परता से ढूंढ रहा है,
प्रेम को, ताकि कर सके
वो उसका खून, चढ़ा सके
उसकी बलि, अपनी रूढ़ियों पर,
पर उम्मीदें मरती नहीं,
हर बार जी उठती है,
किसी न किसी के
मन में, जो देती है हौसला,
आगे बढ़ने का,
तोड़कर रूढ़ियों की जंजीरें,
समाज को आइना दिखाती,
कभी न खत्म होने वाली,
एक 'उम्मीद'।


Image Source - Pixabay

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