Inspirational story.

iamindian(41)
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वेद की कहानी, जिसकी जिंदगी उसकी सहपाठी प्रज्ञा की प्रेरणाओं से बदल गयी।

एक दिन प्रोफ़ेसर कि चटर्जी अपने बेटे के साथ फिल्म देखने जा रहीं थी। वह सिनेमा हॉल के सामने खड़ी थी की तभी उनके सामने एक बड़ी-सी गाडी आकर रुकी। गाडी में से तीस-पैतीस साल का युवक बाहर निकला और सिनेमा की तरफ आगे बढ़ने लगा।
देखने में वह युवक किसी अमीर परिवार का लगता था। उस शख्स ने भी प्रोफ़ेसर चटर्जी को देखा और देखते ही तुरंत सिर झुकाकर नमस्कार किया।प्रोफेसर चैटर्जी को याद आ गया, यह तो उनका पढ़ाया हुआ छात्र वेद है। वह वेद के पास गई और बोली, कैसे हो वेद? दस साल बाद देखा तुम्हे। मुझे आज भी यकीन नहीं होता की तुमने इंजीनियरिंग पास कर ली।

मैं तुम्हे कितना डांटती थी, पर आज तुम्हे देखकर गर्व होता है। वेद ने मुस्कुराते हुए कहा, मुझे सब याद है और मैं आपका आभारी हूं। लेकिन आपको तो याद होगा की मेरा पढ़ाई में एकदम मन नही लगता था। मुझे सही रास्ते पर लाने वाली मेरी दोस्त प्रज्ञा थी, जो मेरे बगल में बैठा करती थी। आपको पता है, मैंने आपकी क्लास में कभी कोई असाइनमेंट नहीं किया। न ही किसी टेस्ट के लिए पढाई की। प्रज्ञा हमेशा मुझसे कहती थी, मैं तुम्हे खराब नंबर लाते हुए नहीं देख सकती। मैं चाहती हूं कि तुम अपनी जिंदगी ऐसे व्यथ ना गवाओ, बल्कि कुछ कर के दिखाओ।

उसकी हर बात को मैने तब नज़रंदाज़ कर दिया था। मैं फायदा उठाकर अपना सारा काम उससे करा लेता था। लेकिन धीरे-धीरे मुझ पर प्रज्ञा की बातों का बहुत गहरा असर पड़ने लगा। मै शरारते और घूमना-फिरना छोड़कर पढ़ाई को गंभीरता से लेने लगा। प्रज्ञा मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती थी। सच कहूं, तो प्रज्ञा उन दिनो मेरी वास्तविक टीचर बन गई थी। उसी की वजह से मैं जिंदगी को समझ पाया हूं। उसी की दी हुई सोच का असर है, की मैं आज इस मुकाम पर पहुच पाया हूं।

उपदेश देना आसान होता है, पर उपदेश से बेहतर होता है उदाहरण।

iamindian@iamindian

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